मक़बूल बट्ट, ये वो नाम है जिसे कश्मीरी कभी नहीं भूल सकते।

Qamar Eqbal

मक़बूल बट्ट, ये वो नाम है जिसे कश्मीरी कभी नहीं भूल सकते। कश्मीर की आज़ादी के लिए मक़बूल बट्ट को पाकिस्तान और हिंदुस्तान दोनों ने मौत की सज़ा सुनाई थी। मक़बूल का मानना था कि कश्मीर का भविष्य न तो हिंदुस्तान के साथ अच्छा होगा और न ही पाकिस्तान के साथ; बल्कि कश्मीर को इन दोनों मुल्कों से आज़ाद होना चाहिए।

बहरहाल, मक़बूल बट्ट को 11 फरवरी 1984 को तिहाड़ जेल में फांसी दे दी गई थी। उस समय के तिहाड़ जेल के जेलर, सुनील गुप्ता ने, अपनी किताब ‘ब्लैक वारंट’ में एक अजीब बात बताई है कि मक़बूल को फांसी दी जानी तय थी, मगर जिस वक्त उसे फांसी दी गई, वो केवल “इंदिरा गांधी” सरकार की मक़बूल बट्ट के समर्थकों को जवाब देने के लिए था।

दरअसल, जब मक़बूल बट्ट को फांसी की सज़ा सुनाई गई, उसके समर्थकों ने एक भारतीय राजनयिक, रवींद्र म्हात्रे, को जान से मार दिया था, जिसके बाद आम लोग अपना गुस्सा इंदिरा सरकार पर दिखाने लगे। इन दोनों परिस्थितियों का सामना करते हुए, इंदिरा सरकार ने तुरंत एक्शन लिया और मक़बूल बट्ट को फौरन फांसी दिलवाई।

सुनील गुप्ता अपनी किताब में आगे लिखते हैं कि मक़बूल को आनन-फानन में जैसे-तैसे फांसी तो दी गई थी, मगर उस वक्त जेल का माहौल बिगड़ गया था। फांसी के बाद मक़बूल की बॉडी उसकी फ़ैमिली को नहीं लौटाई गई, बल्कि तिहाड़ में ही मौलवी बुलाकर नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ाई गई और वहीं दफ़ना दिया गया।

तिहाड़ जेल में मक़बूल बट्ट के स्वभाव से वहाँ के कई क़ैदी प्रभावित हुए थे, यहाँ तक कि कई मुद्दों पर सुनील गुप्ता भी मक़बूल की बातों से सहमत हुआ करते थे और उसकी बुद्धि की तारीफ किया करते थे। उन्होंने मक़बूल से अंग्रेज़ी में बातचीत करना भी सीखा था।

यही कारण रहा कि बट्ट की मौत के बाद क़ैदी ही नहीं, बल्कि वहाँ के जेलर भी मक़बूल की फांसी कोठी में जाने से डरते थे। यहाँ तक कि सुनील गुप्ता खुद भी डरते थे।

सुनील लिखते हैं, “मैं इस बात को स्वीकार करता हूँ कि बट्ट की फांसी के बाद से मैं फांसी कोठी से थोड़ा डरने लगा था और वहाँ जाने के लिए किसी गार्ड या सहायक से अपने साथ चलने के लिए कहता था। मैं जान-बूझकर उसकी कब्र की ओर देखने से बचता था। मुझे वह घटना याद है, जब उधर से गुजरते हुए एक कैदी चिल्लाया था, ‘सर, सर! वह देखिए, वहाँ मक़बूल बट खड़ा है।’ उसने रोते हुए कसम खाकर कहा कि उसने उसे अपने सफेद कुरते-पाजामे में खड़ा देखा था।
और ऐसी कहानियाँ केवल क़ैदियों ने ही नहीं बल्कि तिहाड़ में कार्यरत तमिलनाडु स्पेशल पुलिस के जवानों ने भी सुनाईं थीं। उनमें से कई ने मक़बूल बट्ट को उसकी कब्र के पास खड़ा साफ़ तौर पर देखा था। उस वक्त फांसी कोठी के आसपास केवल उन्हीं कैदियों को रखा जाता था जो अत्यंत खतरनाक श्रेणी के थे। लेकिन सर्वाधिक खूंखार कैदियों ने भी वहाँ अकेले रहने से इनकार कर दिया था।”

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