पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव—खासतौर पर ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच टकराव और युद्ध —ने पूरी दुनिया की राजनीति को अस्थिर कर दिया है। ऐसे समय में भारत जैसे बड़े और स्वतंत्र राष्ट्र की विदेश नीति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने राष्ट्रीय हित, संप्रभुता और स्वतंत्र निर्णय क्षमता को सर्वोपरि रखे। लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत की विदेश नीति सचमुच उतनी स्वतंत्र और आत्मनिर्भर है, जितनी दिखाई जाती है। इस युद्ध में भारत को तटस्थ रहकर अपनी हितों की रक्षा करनी चाहिए थी लेकिन अमेरिकी दबाव में भारत सरकार इज़राइल के पक्ष में झुकते नजर आ रहे हैं, जबकि ईरान से हमारे ऐतिहासिक संबंध हैं।
हाल ही में भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए अमेरिका की ओर से अनुमति लेने जैसी अत्यंत चिंताजनक खबर सामने आई है। यह स्थिति अपने आप में कई गंभीर सवाल खड़े करती है। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए किसी दूसरे देश की “अनुमति” का इंतजार क्यों करेगा? क्या भारत की स्वतंत्र विदेश नीति अब वाशिंगटन की मर्जी पर टिकी है? ट्रम्प प्रशासन ने पहले भारत पर रूसी तेल आयात के लिए 25% टैरिफ लगाया था, और अब इस ‘अस्थायी वेवर’ को एक ‘उपकार’ की तरह पेश किया जा रहा है। यह हमारी संप्रभुता पर सीधा हमला है, अगर हमारी ऊर्जा सुरक्षा अमेरिकी हितों के अधीन हो गई है तो यह हमारी राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए खतरनाक और चिंताजनक संकेत है।
भारत की विदेश नीति की ऐतिहासिक परंपरा हमेशा स्वतंत्र रही है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की अवधारणा के माध्यम से दुनिया को यह संदेश दिया था कि भारत किसी भी वैश्विक शक्ति के दबाव में नहीं बल्कि अपने राष्ट्रीय हित और नैतिक मूल्यों के आधार पर निर्णय लेगा। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए इंदिरा गांधी ने भी कई मौकों पर भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूती से कायम रखा।
लेकिन आज के हालात में ऐसा लगता है कि भारत की विदेश नीति में आत्मविश्वास और स्वतंत्रता बिल्कुल कमज़ोर पड़ती हुई दिख रही है, हकीकत में मोदी सरकार की विदेश नीति अमेरिकी दबाव के आगे पूरी तरह झुक चुकी है। जब दुनिया के कई देश अपने ऊर्जा हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं, तब भारत जैसे देश के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को बिना किसी बाहरी दबाव के तय करे।
ईरान और पश्चिम एशिया के साथ भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज़ से भी यह क्षेत्र भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे में भारत की नीति संतुलित, स्वतंत्र और राष्ट्रीय हितों पर आधारित होनी चाहिए। अगर हमारी विदेश नीति ऐसी स्थिति में पहुँच जाए कि हमें अपने आर्थिक फैसलों के लिए भी किसी महाशक्ति की अनुमति का इंतजार करना पड़े, तो यह लोकतांत्रिक आत्मसम्मान के खिलाफ है।
भारत एक संप्रभु राष्ट्र है और उसकी नीतियाँ भी उसी आत्मसम्मान के अनुरूप होनी चाहिए। आज जरूरत इस बात की है कि भारत अपनी विदेश नीति को फिर से उस मूल भावना की ओर ले जाए, जहां राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हो, और दुनिया को यह स्पष्ट संदेश मिले कि भारत अपने फैसले खुद लेने की क्षमता और साहस रखता है।
तौकीर आलम, राष्ट्रीय सचिव कांग्रेस पार्टी व पूर्व प्रत्याशी बरारी विधानसभा
( ये लेखक के अपने विचार हैं )













