केंद्र सरकार ने हाल ही में एक बड़ा फैसला लिया है, जिसके तहत सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और सभी औपचारिक समारोहों में वंदे मातरमके पूरे छह छंद गाने या बजाने को अनिवार्य कर दिया गया है। गृह मंत्रालय ने 6 फरवरी 2026 को जारी किए गए आदेश में साफ कहा है कि जब राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम और राष्ट्रीय गान जन गण मन दोनों साथ में बजाए या गाए जाए, तो पहले वंदे मातरम आएगा। इस दौरान मौजूद सभी लोग खड़े होकर ध्यान की मुद्रा में रहेंगे। पूरा आधिकारिक संस्करण लगभग 3 मिनट 10 सेकंड का होगा।
यह नियम स्कूल असेंबली, सरकारी आयोजनों, नागरिक सम्मान समारोहों (जैसे पद्म पुरस्कार), झंडा परेड, राष्ट्रपति या राज्यपालों से जुड़े कार्यक्रमों पर लागू होगा। राष्ट्रपति के आने-जाने पर, उनके राष्ट्र को संबोधन के पहले और बाद में, और राज्यपालों के राजकीय समारोहों में भी यह गीत बजाया जाएगा।
यह फैसला इसलिए खास है क्योंकि यह बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1875 में लिखे गए वंदे मातरम गीत की 150वीं वर्षगांठ के मौके पर आया है। पहले स्वतंत्र भारत में केवल पहले दो छंदों को ही आधिकारिक तौर पर अपनाया गया था, ताकि यह सभी धर्मों के लिए स्वीकार्य रहे। लेकिन अब सरकार ने पूरे छह छंदों को अनिवार्य कर दिया है।
इस फैसले पर मुस्लिम संगठनों और वामपंथी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इसे धार्मिक स्वतंत्रता, संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना और सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों के खिलाफ बताया है।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने सरकार से इस अधिसूचना को तुरंत वापस लेने की मांग की है। बोर्ड के महासचिव मौलाना मोहम्मद फजलुर रहीम मुजद्दिदी ने कहा, “यह फैसला मुसलमानों के लिए बिल्कुल अस्वीकार्य है। यह असंवैधानिक है, धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ है, धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों से टकराता है और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के विरुद्ध है।” उन्होंने आगे कहा कि रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह और संविधान सभा की लंबी चर्चा के बाद ही केवल पहले दो छंद चुने गए थे। एक धर्मनिरपेक्ष सरकार किसी धर्म की मान्यताओं को दूसरे पर थोप नहीं सकती। अगर सरकार नहीं मानी तो अदालत में चुनौती दी जाएगी।
The central government’s notification making it mandatory to recite all verses of “Vande Mataram” in schools and official functions is unconstitutional, against religious freedom, secular values, and contrary to the Supreme Court’s Judgment. The song contains references to the… pic.twitter.com/NTNFRdWU6P
— All India Muslim Personal Law Board (@AIMPLB_Official) February 12, 2026
गीत में दुर्गा, लक्ष्मी समेत देवी-देवताओं की वंदना के संदर्भ हैं, जो मुसलमानों की एकेश्वरवाद वाली आस्था से सीधे टकराते हैं। मुसलमान केवल अल्लाह की इबादत करते हैं, किसी को उनके साथ साझीदार नहीं मानते।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) ने बीजेपी सरकार पर आरोप लगाया कि यह राष्ट्रीय गीत और गान को लेकर अनावश्यक विवाद खड़ा करने की कोशिश है, जिसमें छिपे मकसद हैं। पार्टी ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 51ए(ए) में राष्ट्रीय ध्वज और गान का सम्मान करने की बात है, लेकिन संविधान सभा ने राजेंद्र प्रसाद के बयान पर केवल दो छंद अपनाए थे क्योंकि बाकी छंद धर्मनिरपेक्ष भारत की छवि से मेल नहीं खाते। सरकार को संविधान की भावना का सम्मान करते हुए यह आदेश वापस लेना चाहिए।
सीपीआई के राज्यसभा सांसद संदोष कुमार पी ने कहा, “हमारे लिए देश पहले है, बीजेपी के लिए चुनाव पहले हैं।” उन्होंने यह भी कटाक्ष किया कि जो लोग स्वतंत्रता संग्राम में शामिल नहीं थे और ब्रिटिशों के अधीन रहे, वे आज राष्ट्रवाद का प्रमाण-पत्र बांट रहे हैं।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने एक्स पर लिखा कि यह फैसला एकतरफा और जबरदस्ती वाला है। यह संविधान द्वारा दी गई धार्मिक स्वतंत्रता पर खुला हमला है और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सीमित करने की कोशिश है। अनुच्छेद 25 का उल्लंघन है। कुछ छंद मातृभूमि को देवी के रूप में दिखाते हैं, जो एकेश्वरवाद से टकराते हैं।
The Central Government’s unilateral and coercive decision to make “Vande Mataram” the national song and to mandate all its stanzas in all government programmes, schools, colleges, and functions is not only a blatant attack on the freedom of religion guaranteed by the Constitution…
— Arshad Madani (@ArshadMadani007) February 12, 2026
मौलाना हकीमुद्दीन कासमी ने कहा कि भारत बहुलवादी देश है, जहां ‘एकता में विविधता’ की नींव है। मुसलमान गीत के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन इसे अनिवार्य बनाना धार्मिक स्वतंत्रता पर रोक है। देशभक्ति हमारे धर्म का हिस्सा है, हम देश से प्यार करते हैं, लेकिन पूजा जैसी अभिव्यक्ति नहीं मान सकते।
*वंदे मातरम से संबंधित सर्कुलर संविधान के अनुच्छेद 25 के विरुद्ध, धार्मिक स्वतंत्रता खत्म करने कोशिश*
— Jamiat Ulama-i-Hind (@JamiatUlama_in) February 12, 2026
*-जमीअत उलमा-ए-हिंद की दो-टूक घोषणा*
नई दिल्ली, 12 फरवरी, 2026: जमीअत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से वंदे मातरम को लेकर… pic.twitter.com/2TGip8xjFv
मुस्लिम सिविल सोसाइटी और अन्य संगठनों ने इसे पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले सांप्रदायिक राजनीति और ध्रुवीकरण की कोशिश बताया। उन्होंने कहा कि सच्ची देशभक्ति नारों में नहीं, चरित्र और बलिदान में दिखती है। ऐसे फैसले देश की शांति और एकता को कमजोर करते हैं।
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा कि वंदे मातरम राष्ट्रीय गीत है, हम इसका सम्मान करेंगे। लेकिन गाने-बजाने के मामले में सजदा केवल अल्लाह के लिए है, किसी और के लिए नहीं।
भारतीय अदालतों ने भी पहले अन्य छंदों को धर्मनिरपेक्षता से असंगत माना है और उनकी अनिवार्यता सीमित की है।
यह पूरा विवाद गीत की 150वीं सालगिरह पर उठा है, जहां पहले दो छंदों को सभी धर्मों के लिए समावेशी माना गया था क्योंकि वे सिर्फ भूमि की सुंदरता की तारीफ करते हैं। अब पूरे छह छंद अनिवार्य होने से बहस छिड़ गई है कि क्या यह देश की एकता बढ़ाएगा या विवाद पैदा करेगा।













