क्या राहुल गांधी बना रहे हैं मंडल 2.0 की ज़मीन?

देश में लंबे समय से चली आ रही जातिगत जनगणना की मांग को आखिरकार केंद्र सरकार ने स्वीकार कर लिया है। सरकार की अधिसूचना के मुताबिक यह जनगणना दो चरणों में कराई जाएगी। पहला चरण 1 अक्टूबर 2026 से और दूसरा चरण 1 मार्च 2027 से शुरू होगा। पहले चरण में जातिगत जनगणना उन चार राज्यों में कराई जाएगी जो पहाड़ी क्षेत्र आते हैं. उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, लद्दाख और जम्मू-कश्मीर। लेकिन इस घोषणा के बावजूद कांग्रेस नेता राहुल गांधी इस मुद्दे को छोड़ नहीं रहे हैं. बल्कि और तेज़ी से उठा रहे हैं।

ओडिशा की एक जनसभा में उन्होंने दो टूक कहा:
“बदलाव की पहली शर्त जातिगत जनगणना है। यही हमारा सबसे बड़ा औज़ार है।”

राहुल गांधी का कहना है कि जातिगत जनगणना से दलित, पिछड़ों, आदिवासियों और गरीब सवर्णों को अपनी “सच्ची शक्ति” का एहसास होगा। और जिस दिन ये वर्ग अपनी असली ताक़त पहचान लेंगे उस दिन सत्ता का चेहरा बदल जाएगा।

उनकी यह टिप्पणी ऐसे वक्त में आई है जब जातिगत जनगणना पर बहस देशभर में तेज़ हो चुकी है और केंद्र सरकार ने भी एक लंबी मांग को आंशिक रूप से स्वीकार किया है। ऐसे में यह सवाल उठता है. क्या राहुल गांधी भारत में “मंडल 2.0” की ज़मीन तैयार कर रहे हैं?

संसद से सड़क तक: राहुल गांधी की ज़बान में हिस्सेदारी की लड़ाई।

भारत जोड़ो यात्रा और फिर भारत न्याय यात्रा के दौरान राहुल गांधी बार-बार कहते रहे हैं:
“अगर हमारी सरकार केंद्र में आएगी तो हम देश में जातिगत जनगणना कराएंगे।”

संसद में पूछे गए सवालों का जिक्र करते हुए वो अक्सर कहते हैं कि उन्होंने सरकार से पूछा कि नीतिगत फैसले लेने वाले शीर्ष अफसरों में ओबीसी, SC, ST की हिस्सेदारी कितनी है? उनका दावा है कि देश के 90 टॉप IAS अफसरों में सिर्फ 3 ओबीसी और 3 आदिवासी अफसर हैं और वे भी अपेक्षाकृत मामूली जिम्मेदारियों वाले पदों पर तैनात हैं।

राहुल गांधी का तर्क है कि बजट जैसे बड़े फैसलों में. जहां देश के संसाधनों का बंटवारा तय होता है, वहां OBC की भागीदारी महज़ 5% और आदिवासियों की सिर्फ 0.1% है. जबकि ये वर्ग देश की आधी से ज़्यादा आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं।

2023 की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने जब पत्रकारों से पूछा:
“इस कमरे में कितने दलित, आदिवासी और ओबीसी पत्रकार हैं?”
और जब सिर्फ एक हाथ उठा तो उन्होंने दो टूक कहा:
“हम आपकी बात नहीं कर रहे हैं. आप कैमरामैन हो। हम सवाल पूछने वालों की बात कर रहे हैं। यह वही अदृश्यता है, जिसके ख़िलाफ़ हम लड़ रहे हैं।”

देश में OBC की आबादी कितनी है?

जातिगत जनगणना की राजनीति का सबसे बुनियादी सवाल यही है: आख़िर देश में OBC की वास्तविक संख्या कितनी है?

स्रोत अनुमानित OBC आबादी-

1.मंडल आयोग (1980) 52% (1931 की जनगणना पर आधारित)
2.कालेलकर आयोग (1955) 32%
3.NSSO सर्वे 41%
4.विपक्ष का दावा 60% से अधिक

ये आंकड़े जब राज्य-स्तरीय जातिगत जनगणना से जोड़ते हैं तो तस्वीर और स्पष्ट हो जाती है. जिनमें अक्सर कहा जाता है कि देश की कुल आबादी में ओबीसी से आने वाले जातियों की आबादी आधी से ज्यादा है।

बिहार (2023):
कुल आबादी – 13 करोड़
OBC – 27.22%, EBC – 36.01% → कुल 63%
(जातिगत जनगणना तत्कालीन महागठबंधन सरकार द्वारा कराई गई. जिसमें कांग्रेस, RJD और लेफ्ट की पार्टियां शामिल थी. लेकिन बिहार जातिगत जनगणना का सबसे बड़ा पहलू ये था कि इस जातिगत जनगणना में बिहार बीजेपी इकाई का भी सरकार को साथ मिला हुआ था. जबकि उस समय बीजेपी जातिगत जनगणना कराने के पक्ष में नहीं थी। )

तेलंगाना (2024):
OBC – 46.25%, SC – 17.43%, ST – 10.45%
(रेवंत रेड्डी की कांग्रेस सरकार द्वारा कराई गई जातिगत गणना)

कर्नाटक (2015, लीक डेटा):
OBC – लगभग 70%
(आधिकारिक रिपोर्ट जारी नहीं, लेकिन 2025 में कांग्रेस सरकार ने पारदर्शी पुनर्गणना कराने का वादा किया है)

राहुल गांधी की मांग है कि जब तक राष्ट्रीय स्तर पर यह डेटा सामने नहीं आता, तब तक सत्ता और संसाधनों में समान हिस्सेदारी की बात अधूरी रहेगी।

क्या प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व ही काफी है?

मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में कुल 72 मंत्रियों में से 27 OBC समुदाय से आते हैं, जिनमें खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हैं। लेकिन कांग्रेस और विपक्ष का तर्क है कि यह सिर्फ प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व है। असली सवाल यह है कि नीतिगत फैसलों और सत्ता के केंद्रों में OBC की भूमिका कितनी है? ओबीसी जाति से आने वाले कितने चेहरे को अहम मंत्रालय सौंपें गए हैं।कांग्रेस का दावा है कि राहुल गांधी की रणनीति इस प्रतीकवाद से आगे जाकर “प्रतिनिधित्व को अधिकार में बदलने” की कोशिश है।

कांग्रेस की सामाजिक इंजीनियरिंग: OBC एडवाइजरी काउंसिल का गठन

जून 2025 में कांग्रेस ने OBC एडवाइजरी काउंसिल का गठन किया जिसमें कुल 24 सदस्य शामिल किए गए। इसकी पहली बैठक दो दिनों के लिए बेंगलुरु में आयोजित हुई। पहली दिन के बैठक खत्म होने के बाद राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा:
“राहुल गांधी जी ने SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक वर्ग के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाई है। उनका साफ कहना है कि आरक्षण की 50% सीमा खत्म होनी चाहिए और देश में जातिगत जनगणना होनी चाहिए, ताकि सबको बराबरी का हक़ मिल सके।”

उन्होंने कहा कि बड़ी कंपनियों और ऊंचे पदों पर इन वर्गों की भागीदारी बेहद कम है, और समाज में आज भी छुआछूत और आर्थिक असमानता जैसी समस्याएं हैं। इन्हें खत्म करने के लिए राहुल गांधी सड़कों पर उतरे हैं और कांग्रेस पार्टी मजबूती से उनके साथ खड़ी है।

इस काउंसिल में कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, सचिन पायलट, वीरप्पा मोइली, अजय लल्लू जैसे दिग्गज शामिल हैं। कन्वीनर बनाए गए अनिल जयहिंद, और सचिव जितेंद्र बघेल।

कांग्रेस का कहना है कि यह परिषद OBC समुदाय के हितों की रक्षा, संगठनात्मक प्रतिनिधित्व में वृद्धि और नीतियों को सामाजिक न्याय के अनुरूप ढालने के लिए काम करेगी। वही राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह परिषद कांग्रेस के मंडल 2.0 विज़न की पहली संगठित इकाई है और आगामी चुनावों में इसकी बड़ी भूमिका हो सकती है।

क्या यह सिर्फ नारा है या सामाजिक सत्ता का नया अध्याय?

राहुल गांधी की जातिगत जनगणना की मांग कोई साधारण चुनावी वादा नहीं है. यह भारत के लोकतंत्र की उस अदृश्य परत को उजागर करने की कोशिश है, जिसमें संख्या के अनुपात में हिस्सेदारी की माँग की जाती है। मंडल 1.0 की लड़ाई ने सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण के ज़रिए दरवाज़ा खोला था।
लेकिन मंडल 2.0 जैसा कि राहुल गांधी इसे परिभाषित कर रहे हैं अब नीति निर्माण, बजट, ब्यूरोक्रेसी, मीडिया और न्यायपालिका तक समान भागीदारी की बात करता है।लेकिन इस सोच को ज़मीन पर उतारने के लिए राहुल गांधी को अपने दल और गठबंधन शासित राज्यों कर्नाटक, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, राजस्थान और तमिलनाडु में इसे व्यावहारिक रूप से लागू कर के दिखाना होगा। क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ सत्ता बदलने की नहीं, बल्कि सत्ता के स्वरूप को बदलने की है।

आख़िरी सवाल क्या राहुल गांधी इस एजेंडे को नारे से नीति तक और नीति से आंदोलन तक ले जा पाएंगे? अगर वह ऐसा कर पाए, तो यह न सिर्फ कांग्रेस की वापसी होगी बल्कि भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय की नई दस्तक होगी जिसे आने वाली पीढ़ियां शायद “मंडल 2.0” के नाम से याद रखेंगी।

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