जवानी में मंत्री पद छोड़ा, तो बुढ़ापे में मिला राज्यपाल की कुर्सी, जाने कौन है बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद.

आरिफ मोहम्मद मौजूदा बिहार राज्य के राज्यपाल है, जो 80 के दशक में काफी चर्चित नेताओं में से एक है. मोदी सरकार ने पहले 2019 में केरल का राज्यपाल बनाया था. एक बार फिर मोदी सरकार ने भरोसा करके दक्षिण भारत से लाकर उत्तर भारत के बिहार में राज्यपाल की जिम्मेदारी दी है. वर्तमान में राजनैतित गलियारों में इसे कई मायनों में जोड़कर देखा जा रहा है. लेकिन आज जानेंगे कि कौन है आरिफ मोहम्मद खान और आखिर इतना चर्चा में क्यों है.

18 नवंबर 1951 को आरिफ मोहम्मद खान का जन्म उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में हुआ है. केरल राजभवन वेबसाइट के अनुसार आरिफ मोहम्मद स्कूली शिक्षा जामिया मिल्लिया इस्लामिया दिल्ली में हासिल की. प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से 1973 में बीए और लखनऊ यूनिवर्सिटी से 1977 में एलएलबी की पढ़ाई की.

आरिफ मोहम्मद छात्र जीवन में ही राजनीति में आ चुके थे. उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र संघ में 1972-73 में महासचिव और 1973-74 को अध्यक्ष चुने गए थे. आरिफ मोहम्मद महज 26 साल की उम्र में ही 1977 में बुलंदशहर के सियाना विधानसभा से चुनाव जीतकर उत्तर प्रदेश विधानसभा पहुंचे थे.

केरल में क्यों चर्चा में रहे राज्यपाल आरिफ मोहम्मद?

2019 में केरल का राज्यपाल बनने के बाद आरिफ मोहम्मद हमेशा सुर्खियों में रहा है. केरल के मुख्यमंत्री पीनराई विजयन राज्यपाल के खिलाफ आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट तक गई है. केरल सरकार का आरोप था कि हमारे द्वारा विधानसभा में पारित कानूनों को राज्यपाल मंजूरी नहीं देते थे. केरल सरकार का ये भी आरोप था कि राज्यपाल आरएसएस को हथियार के रूप में कम कर रहे हैं. इस पर राज्यपाल ने जवाब दिया था कि अगर एक भी मामला आरएसएस से जुड़ा मिला तो इस्तीफा दे दूंगा. ऐसे में राज्यपाल के कार्यकाल के दौरान केरल सरकार से तकरार देखने को मिला है.

कम उम्र में ही संसद बनकर मंत्री बने

आरिफ मोहम्मद खान पहली बार सातवीं लोकसभा 1980 में कानपुर से सांसद बने थे. उसके बाद 1984, 1989 और 1998 में बहराइच लोकसभा से सांसद चुने गए थे. सांसद रहते हुए कई मंत्रालय में कार्यभार संभाले हैं. आरिफ मोहम्मद को सबसे पहले सूचना प्रसारण विभाग में उपमंत्री बनाया गया था. इसके बाद कृषि, ऊर्जा, उद्योग और गृह राज्य मंत्री भी बने थे, उन्होंने राजीव गांधी की कैबिनेट में ऊर्जा और नागरिक उड्डयन मंत्री थे.

शाहबानो मामले में आरिफ मोहम्मद ने इस्तीफा क्यों दिया

आरिफ मोहम्मद राजीव गांधी कैबिनेट में मंत्री थे. 1886 में बतौर राजीव गांधी तत्कालीन प्रधानमंत्री रहते हुए अयोध्या और शाहबानो मामले में अपना रुख अपनाया था. जिससे देश सांप्रदायिकता की आग में झुलसा है. यही कारण है कि आरिफ मोहम्मद मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था.

दरअसल, इंदौर की एक मुस्लिम महिला शाहबानो का तलाक से जुड़े केस का फैसला आया था. जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने महिला की हक में फैसला देते हुए पति से तलाक के बदले हर्जाना देने का आदेश दिया था. लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने कुछ कट्टरवादियों के कारण इस फैसले को पलट दिया था.

जुलाई 2019 में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में आरिफ मोहम्मद ने कहा है कि जब वह इस्तीफा दिया तो कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने उसे मनाने के लिए उनके पास आए थे. उन्होंने कहा कि उस उक्त के वरिष्ठ नेता पीवी नरसिम्हा राव तक उसे मनाने के लिए पहुंचे थे. राज्यपाल आरिफ मोहम्मद ने ये भी कहा कि कांग्रेस 400 से अधिक सीट लाने के बाद भी कुछ कट्टरपंथी के आगे मजबूर थे.

‘मुसलमान गटर में रहना चाहते हैं’ क्या है मामला

बीबीसी को दिए इंटरव्यू में आरिफ मोहम्मद कहते हैं कि जब नरसिम्हा राव उनके पास आए तो उन्होंने कहा ‘तुम इस्तीफा क्यों दे रहे हो, तुम्हारा लंबा कैरियर है, इस मामले में अब शाहबानो भी मान गई है, हम कोई समाज सुधारक नहीं हैं, अगर मुसलमान गटर में रहना चाहते हैं तो रहने दो’.
इस वाक्या को लेकर आरिफ मोहम्मद कहते हैं कि ‘पीवी नरसिम्हा राव जिंदा रहते मैंने ये बात कही थी’, लेकिन इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. अगर आई है तो मुझे इसके बारे में जानकारी नहीं है.

ये था मौजूदा बिहार के राज्यपाल की राजनीतिक का उतार चढ़ाव सी जिंदगी की कहानी. जिन्होंने अपने कम उम्र की जीवन में विधायक, सांसद और मंत्री तक बने और फिर राजनीति से ब्रेक के 20 साल बाद 2019 को केरल में राज्यपाल के तौर पर कार्य संभाले. उसके बाद 2024 में बिहार के राज्यपाल के तौर पर नियुक्त किया गया. आरिफ मोहम्मद खान की किताब “टैक्स्ट एंड कॉन्टेक्स्ट: कुरान एंड कंटेंपरेरी चैलेंज” 2010 में प्रकाशित हुई है.

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