हिन्दुस्तान में मदरसों को लेकर फिर से बहस छिड़ी हुई है। जिसके बारे में कहा जा रहा है यहाँ सिर्फ धार्मिक शिक्षा देकर ‘आतंकवाद’ और ‘कट्टरता’ के ककहरे सिखाए जाते हैं। ये पूरी तरह से आधुनिक शिक्षा के खिलाफ है। दरअसल ये बहस असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा के उस बयान के बाद छिड़ी है जिसमें उन्होंने कहा कि असम सरकार ने 600 मदरसों को बंद कर दिया है। सरकार की यही कोशिश रहेगी कि सभी मदरसों को बंद किया जाए क्योंकि सरकार मदरसे नहीं चाहती। वह स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी चाहते हैं। वही पिछले साल अगस्त में उन्होंने अपने बयानों में मदरसों को आतंकवादी ट्रेनिंग का हब बताते हुए कहा था कि यहाँ शिक्षा के बजाय ‘आतंकी’ ट्रेनिंग दी जाती है।
मदरसों पर आतंकवादी संलिप्तता के आरोप में बुलडोज़र कार्रवाई
असम के मुख्यमंत्री पिछले दो सालों से लगातार असम के अंदर मदरसों पर आतंकवादी संलिप्तता के आरोप की बात कर बुलडोज़र कार्रवाई करते रहे हैं। जिसके कड़ी में इन्होंने राज्य सरकार के ओर से मदरसों को मिलने वाले अनुदान राशि को 2020 से ही रोक दिया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक अनुदान राशि ना मिलने के वजह से असम के 800 से ज्यादा मदरसे बंद हो चुके हैं। वही प्राइवेट रूप से चलने वाले मदरसों पर आरोप की बात कर कार्रवाई की जा रही है। ऐसा पहली बार नहीं है। समय – समय पर बीजेपी के नेताओं के तरफ से मदरसे पर कार्रवाई कर उसको बंद करने की माँग की जाती रही है। इसमें एक नया नाम पाटिल नतयाल का जुड़ा है जो कर्नाटक से बीजेपी विधायक हैं। इन्होंने अपने बयानों में कहा है कि अगर कर्नाटक में बीजेपी सत्ता में आई तो वहां असम की तरह सारे मदरसे को बंद कर दिए जाएंगे। जब से बीजेपी सरकार केंद्र में है, तब से खासतौर से बीजेपी शासित राज्यों में मदरसों को बंद करने की माँग उठती रही है।
क्या है मदरसों का इतिहास
मदरसा एक अरबी शब्द है, जिसका मतलब होता है पढ़ने का स्थान। यानी जहां पर शिक्षण का कार्य होता है। मूलरूप से ये हिब्रू भाषा से अरबी में आया है जिसे हिब्रू में ‘मिदरसा’ भी कहा जाता है। जैसे हिंदी का ‘पाठशाला’ और अँग्रेजी का ‘स्कूल’। विश्व का पहला मदरसा ग्यारहवीं शताब्दी में बगदाद में खोला गया था जिसका नाम ‘निजामिया मदरसा’ था। इसे सेल्जुक वजीर निजाम अल मुल्क ने बनवाया था। इसमें भोजन के साथ-साथ आवासीय व्यवस्था पूरी तरह से निःशुल्क था।
आम तौर पर मदरसे को कट्टरपंथी ज्ञान का केंद्र बताने वाले इसके इतिहास से परिचित नहीं होते हैं। इसे समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को कुरेदना होगा। इन इस्लामिक स्कूलों का इतिहास कभी वैभवशाली भी रहा है। कभी इन मदरसों में देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद, समाज सुधारक राजा राम मोहन राय जिन्हें हिन्दुस्तान प्रेस का पितामह भी बोला जाता है और कथा सम्राट मुंशी प्रेमंचद ने शुरुआती शिक्षा ग्रहण किया था। वहीं हिन्दुस्तान में मदरसों की बात करें तो सबसे पहला मदरसा के खोलने का प्रमाण गौरी शासन के दौरान देखने को मिलता है, जिसको 1191-92 ईस्वी के दौरान अजमेर में खोला गया था। लेकिन यूनेस्को की माने, तो हिन्दुस्तान में मदरसे की शुरुआत 13वीं शताब्दी में हुई है जो ग्वालियर में देश का पहला मदरसा बताता है। हिन्दुस्तान में अंग्रेजों ने भी मदरसे खोले। वारेन हेस्टिंग्स ने 1781 में कोलकाता में अँग्रेजी सरकार का पहला मदरसा खोला।
अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को लेकर क्या कहता है संविधान
हिन्दुस्तान का संविधान के अनुच्छेद 29-30 के अनुसार अल्पसंख्यकों को अपने अनुसार शिक्षण संस्थान चलाने और उन्हें शिक्षण संस्थानों के संरक्षण का पूरा अधिका है। आजकल के बयानवीरों के उस बयान को रखेंगे जिसमें वो मांग करते है कि मदरसों को पूरी तरह से बंद कर देनी चाहिए, तो ये पूरी तरह से आपत्तिजनक और संविधान के विरुद्ध है। खासतौर से जब ये एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति करे तो ऐसे मामलों में तो न्यायालय को आगे बढ़कर खुद ही कार्रवाई करनी चाहिए और कर उनपर लगाम लगानी चाहिए। अनुच्छेद 29 कहता है कि हिन्दुस्तान के किसी भाग में रहने वाले नागरिको की किसी भी अनुभाग को जिसकी अपनी बोली, भाषा, लिपि, संस्कृति को सुरक्षित रखने का अधिकार है। वहीं अनुच्छेद 30 में शिक्षा संस्थानों की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्ग के अधिकार के बारे में बात किया गया है, जिसमें अल्पसंख्यकों को धर्म और भाषाओं के आधार पर ये अधिकार दिए गए हैं।
-सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का पूरा अधिकार होगा।
-राज्य आर्थिक सहायता में अल्पसंख्यकों द्वारा प्रबंधित संस्थानों को विभेद नहीं करेगा।
अगर देखें तो हिन्दुस्तान में तीन तरह के अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान देखने को मिलते हैं।
- राज्य से अर्थिक मदद व मान्यता लेने वाले संस्थान
- ऐसे संस्थान जो राज्य से मान्यता लेते हैं लेकिन उसे आर्थिक सहायता प्राप्त नहीं होती है।
- ऐसे संस्थान जो राज्य से ना तो आर्थिक सहायता लेते हैं और ना ही उनसे मान्यता प्राप्त करते हैं।
आजकल सत्ता के शिखर पर विराजमान लोग न सिर्फ संविधान के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं बल्कि देश की एक बड़ी आबादी को शिक्षा से दूर रखने के एजेंडे पर काम कर रहे हैं। इनमें ज्यादातर राज्य सरकार न सिर्फ अपने ओर से मदरसे को मिलने वाले आर्थिक मदद को रोक रहे हैं बल्कि मुसलमानों द्वारा स्वयं चलाए जाने वाले शिक्षण संस्थानों पर भी बाधा डाल रहे हैं। वहीं जब आप सच्चर कमेटी की रिपोर्ट देखेंगे तो आपको रोना आयेगा जिसमें कहा गया है कि मुसलमानों की स्थिति कई मामलों में देश के दलितों से भी बदत्तर है। इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया था कि मदरसे जाकर शिक्षण हासिल करने वाले अल्पसंख्यक बच्चों की तादाद चार प्रतिशत है। अगर मुस्लिम धर्म में मदरसा न हो तो इनके ज़्यादातर आबादी अशिक्षित रहेगी। मुसलमानों को शिक्षित करने में एक अच्छी भूमिका मदरसों की रही है।
वहीं सच्चाई ये है कि जो काम सरकार को मुफ्त शिक्षा के लिए खुद से करनी चाहिए, उस काम को मदरसे बखूबी अंजाम दे रहे हैं। मदरसों ने करोड़ों बच्चों को शिक्षा से जोड़ा है जो देश के तरक्की में अपना योगदान दे रहे हैं। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक मुसलमानों के अर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक स्थिति बेहतर करने के लिए कई सुझाव भी दिए गए थे। लेकिन किसी भी सरकार ने आज तक सुध नहीं ली, जिसने अपने रिपोर्ट में मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्रों में शिक्षण संस्थानों की स्थापनाओं की बात कही थी। देश के स्वतंत्रता के बाद से ही सरकार बंटाधार करने में लगी हुई है। आज भी आपको मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में उनके आबादी के अनुरूप स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी नहीं दिखेंगे। ऐसी स्थिति में पिछड़े और गरीब मुस्लिम बच्चों को शिक्षा देने की जिम्मेदारी ये मदरसे ही निभा रहे हैं जिसको मौजूदा सरकार अपने निशाने पर ले रही है।
देश के आज़ादी में मदरसों का योगदान
हिन्दुस्तान के आजादी की तारीख़ मदरसों के जिक्र किए बगैर पूरी हो ही नहीं सकती है। कोई भी कलमकार इतिहास लिखते वक़्त इसे चाहकर भी नजरंदाज़ नहीं कर सकता है। हिन्दुस्तान के आज़ादी में जो भूमिका मदरसा और उनसे शिक्षा हासिल कर निकले लोगों ने निभाया है वो आज भी हजारों अखबारों के पन्नों सहित लाखों किताबों के पेजों पर दर्ज है। यह साक्ष्य के रूप में अपने अंदर सरफरोश, कुर्बानी सच्चाई और बेबाकी को समेटे हुए है। इन्होंने देश की स्वतंत्रता में अहम भूमिका अदा की है। मदरसे से निकलने वाले उलेमाओं ने ना सिर्फ देश की मुहब्बत के लिए आज़ादी में हिस्सा लिया बल्कि जरूरत महसूस होने पर अंग्रेज सत्ता के खिलाफ लड़ाई में लोगों के भागीदारी के लिए फतवे भी जारी किए।
इनसे लोगों के बीच अंगेजी सत्ता के खिलाफ एक इंकलाब सा पैदा हो गया। अगर हिन्दुस्तानी पत्रकारिता के पहले किसी भी भाषा के पत्रकारिता के शहीद पत्रकारों की भी बात करें, तो उसमें भी मौलवी मोहम्मद बाकर शामिल हैं। इनका संबंध उर्दू पत्रकारिता से था जिन्होंने 1857 के दौरान अपने अखबार ‘देहली अखबार’ के जरिए हिन्दुस्तानियों के अंदर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए जान फूँक दिया था। इसे 1857 के क्रांति थमने के बाद सजा के रूप में तोप से उड़ा दिया गया था। इसके बारे में अंग्रेज इतिहासकार एडवर्ड टामसन ने खुद लिखा है कि आजादी की रूह फूंकने वाले 80,000 से ज्यादा उलेमाओं को 1857 से 1867 तक फांसी पर लटकाया गया। दिल्ली के चांदनी चौक से खैबर तक ऐसा कोई पेड़ नहीं था जिस पर किसी मौलाना की गर्दन न लटकी हुई हो।
ये आंकड़ें यहीं तक सीमित नहीं रहे हैं बल्कि लाखों से ज्यादा उलेमाओं ने इस देश की स्वतंत्रता के लिए अपनी जानें कुर्बान कर दी है।
बीजेपी नेताओं का मदरसे पर आरोप और उनका सच
आज के हिन्दुस्तान में मदरसों पर ये आरोप कहीं भी नहीं टिकते कि यहाँ पर सिर्फ इस्लाम से जुड़ी शिक्षा दी जाती है। या इनमें ‘आतंकवाद’ के ककहरे सिखाए जाते हैं। मदरसों ने हर दौर में मोहब्बत और अमन का संदेश दिया है। अब सभी मदरसों में धार्मिक शिक्षा के साथ – साथ आधुनिक शिक्षा भी दी जाती है। धीरे-धीरे मदरसों ने वक़्त के हिसाब से अपने पाठ्यक्रम में बदलाव कर उनमें कई विषयों को जोड़ा है। जहां पर अब अरबी, उर्दू, हिन्दी, अंग्रेजी, विज्ञान, राजनीतिक विज्ञान और इतिहास के साथ कम्पूटर की शिक्षा भी दी जाती है।
मदरसा एक अच्छा माध्यम है बच्चों को शिक्षित करने का जिसे मदरसे बखूबी अंजाम दे रहे हैं। सत्ता के शिखर पर विराजमान लोगों के द्वारा मदरसों को बंद करने की माँग ना सिर्फ देश के संविधान और एकता के खिलाफ है बल्कि ये संविधान के उन आत्माओं को ठेस पहुँचाती है जिनमें धर्मनिरपेक्षता की बात कही गई है। ये उन साजिशों के ओर भी इशारा करती है जिसमें देश के एक बड़ी आबादी को शिक्षा से दूर रखने की कोशिश की जा रही है। आजकल देश में काम के बातों को छोड़कर हर उस बात पर चर्चा हो रही है जिनसे देश का नुकसान हो रहा है।
देश के जनहित के मुद्दे इनसे बहुत पीछे छुट जा रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि जनहित के मुद्दों पर बात की जाए जिससे देश का विकास हो। देश नित दिन विकास के नए आयाम की गाथा को लिखे। मदरसों ने अतीत में भी देश के लिए अपना बहुमूल्य योगदान दिया है आगे भी जब देश को जरूरत मसहूस होगी ये आगे खड़े मिलेंगे। सत्ता के शिखर पर पहुंचें लोगों को विद्वेष में ऐसे विभाजनकारी बयान और कार्रवाई करने से बचना चाहिए जो कि सिर्फ एक आबादी से द्वेष में लिए जा रहे हैं। सरकार का मकसद सिर्फ जनहित के सरोकार होना चाहिए। ना कि विभेदीकरण वाले राजनीति से अपने स्वार्थों की सिद्धि हो। देश का विकास तभी होगा जब सरकार सभी को साथ लेकर चलेगी।













